Friday, 7 March 2014

हम सँवर जाते

गर तुम यादों की हद से गुज़र जाते
तेरी खातिर फिर से हम सँवर जाते

अब सूरत देख के आईने में क्या करें
तेरी आँखों में बस के, निख़र जाते

तुम इक बार विश्वास करते हमपर
तेरी ख़ातिर सब से दुश्मनी कर जाते

चाह नहीं थी मुझे किसी चाहत की
तुम जो चाह लेते तो हो हम ज़र जाते

यादें बसी हुई है दर-ओ-दीवार में
नहीं तो हम भी गाँव छोड़ शहर जाते
—सुनीता

(ज़र= स्वर्ण, सोना)

11 comments:

  1. बहुत लाज़वाब आपकी रचना।
    हार्दिक बधाई

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  2. अब सूरत देख के आईने में क्या करें
    तेरी आँखों में बस के, निख़र जाते
    लाजवाब।

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  3. फूलो की पंखुडियो से भी ज्यादा कोमल होते है जज्बात ......जो न समझे उसे क्यूं मै समझाऊ ये खूबसूरत बात

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  4. बहूत ही सुंदर शब्द और भाव

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  5. आपकी इस उत्कृष्ट अभिव्यक्ति की चर्चा कल रविवार (27-04-2014) को ''मन से उभरे जज़्बात (चर्चा मंच-1595)'' पर भी होगी
    --
    आप ज़रूर इस ब्लॉग पे नज़र डालें
    सादर

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