Sunday, 23 March 2014

बोली लगी

मैं,
सोचते-सोचते
दूर तलक
निकल गई ॥

न जाने,
आज मुझे
मेरी तन्हाई
क्यूँ अच्छी
लगने लगी ?

बाज़ार से,
गुज़र के भी
बेख़बर रही ॥
सुना 
औरों से
मेरी भी,
बोली लगी ॥
--सुनीता

4 comments:

  1. आपकी बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
    --
    आपकी इस अभिव्यक्ति की चर्चा कल सोमवार (24-03-2014) को ''लेख़न की अलग अलग विद्याएँ'' (चर्चा मंच-1561) पर भी होगी!
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर…!

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  2. बहुत सुन्दर !
    लेटेस्ट पोस्ट कुछ मुक्तक !

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  3. आभार कालीपद प्रसाद जी

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