Wednesday, 12 February 2014

अक्सर

माना कितने ही चिराग़ रोज़ सँवर जाते हैं
पर कुछ सहर होने से पहले बिखर जाते हैं

हाँ ! ये ज़िंदगी काँटों का सफर है लेकिन
फ़िर भी कुछ रास्ते फूलों से गुज़र जाते हैं

मिट्टी के घरोंदे यहाँ टूट जाते हैं अक्सर
हो जब भी यहाँ कुदरत के कहर जाते हैं

जब भी तेरे ख्वाब पलकों में उतर आए
फ़िर वक़्त के लम्हे मानो ठहर जाते हैं


--सुनीता

1 comment:

  1. सुन्दर बेहतरीन प्रस्तुति आपकी। हार्दिक बधाई

    एक नज़र :- हालात-ए-बयाँ: जज़्बात ग़ज़ल में कहता हूँ

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